वृंदावन में उमड़ा आस्था का सागर : 60 फुट ऊँचे चंदन रथ पर विराजे ठाकुर गोदा रंगमन्नार, जयघोषों से गूंजा रंगनाथ मंदिर
13 March 2026, 09:20
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Religious
वृन्दावन | विकास अग्रवाल
श्री रंगनाथ मंदिर के दस दिवसीय ब्रह्मोत्सव में नवमी तिथि पर निकलने वाली रथ यात्रा का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। लगभग 60 फुट ऊँचे चंदन निर्मित विशालकाय और कलात्मक रथ पर जब ठाकुर गोदा रंगमन्नार भगवान विराजमान होकर भक्तों को कृतार्थ करने निकले तो पूरा क्षेत्र जयघोषों से गूंज उठा। हजारों श्रद्धालु रथ के दर्शन और उसे खींचने के लिए उमड़ पड़े।
वैदिक परंपरा के अनुसार प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में ठाकुर रंगनाथ भगवान श्रीदेवी और भूदेवी के साथ निज गर्भगृह से पालकी में विराजमान होकर ज्योतिष गणना के अनुसार मीन लग्न में रथ पर विराजित हुए। मंदिर के पुरोहित विजय किशोर मिश्र और गोविंद किशोर मिश्र ने वेद मंत्रों के साथ देव आह्वान, नवग्रह स्थापना, गणपति पूजन सहित विभिन्न देवताओं का विधिवत पूजन कर दसों दिशाओं की सुरक्षा का आह्वान किया तथा परंपरानुसार पेठे की बलि अर्पित की। लगभग दो घंटे चली पूजा प्रक्रिया के बाद जैसे ही सात कूपों का धमाका और काली का स्वर रथ चलने का संकेत बना, भक्तों का उत्साह दोगुना हो गया। मोटे रस्सों के सहारे रथ को खींचा गया और रस्सा पकड़ने के लिए श्रद्धालुओं में होड़ सी मच गई। रथ यात्रा श्री रंग मंदिर से आरंभ होकर बड़ा बगीचा तक पहुंची, जहां मार्ग भर श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए उमड़ते रहे। रथ की भव्यता और काष्ठ कला देखने योग्य है। लगभग पांच फुट व्यास के ठोस लकड़ी के पहियों पर टिका यह विशाल रथ अद्भुत शिल्प का उदाहरण है। रथ के ऊपर श्वेत वर्ण के चार अलंकृत काष्ठ अश्व स्थापित हैं, जिन्हें रजत आभूषणों से सजाया गया है। रथ के मध्य भाग में यक्ष, गंधर्व, विश्वकर्मा, उच्चैश्रवा अश्व, सिंह-शार्दूल और द्वारपाल जय-विजय की सुंदर प्रतिमाएं विराजमान हैं। ऊपर भगवान का दिव्य सिंहासन स्थापित है, जबकि प्रभु के समीप दो सिंहाकार दानवों की आकृतियां स्थापित हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि वे भगवान को नजर लगने से बचाते हैं। रथ यात्रा को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्तों के समूह रथ खींचने और प्रभु की एक झलक पाने के लिए उत्साहित दिखाई दिए। ब्रज में इस परंपरा को लेकर एक प्रसिद्ध पद भी गाया जाता है। “आय गयौ मेला अब रथ कौ सुन आली री,
देखूँगी सवारी जाय मैं भी रंगनाथ की।
चंदन कौ रथ जामें झल्लर और घंट बंधे,
दीनौं है बनाय क्या ही कारीगरी हाथ की।”